सोमवार, सितंबर 23, 2013

कुछ लघु कवितायें


मेरी थकन उतर जाती है


हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से

मैंने अक्सर यह देखा है मेरी थकन उतर जाती है ।

कोई ठोकर लगी अचानक, जब-जब चला सावधानी से

पर बेहोशी में मंजिल तक, जा पहुँचा हूँ आसानी से

                                       - रामावतार त्यागी (Ram Avtar Tyagi)

वसुधा का नेता कौन हुआ? (रश्मिरथी)


सच है, विपत्ति जब आती है,

कायर को ही दहलाती है,

शूरमा नहीं विचलित होते,

क्षण एक नहीं धीरज खोते,

विघ्नों को गले लगाते हैं,

काँटों में राह बनाते हैं।

                                - रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

सोमवार, मई 13, 2013

एक ही शेर के तीन रूप


लीक-लीक कायर चलें, लीकहिं चले कपूत।
लीक छोड़ तीनों चलें - शायर सिंह सपूत।।

लीक-लीक चींटी चलें, लीकहिं चले कपूत।
लीक छोड़ तीनों चलें - शायर सिंह सपूत।।

लीक-लीक गाड़ी चलें, लीकहिं चले कपूत।
लीक छोड़ तीनों चलें - शायर सिंह सपूत।।

एक ही शेर के तीन रूप, मुझे पहलावाला ज्यादा असरदार लगा।

शुक्रवार, अप्रैल 19, 2013

मन कहीं भी रहे पर डिगेगा नहीं

डॉ विष्णु सक्सेना की एक कविता......

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा, एक आई लहर कुछ बचेगा नहीं।
तुमने पत्थर सा दिल हमको कह तो दिया पत्थरों पर लिखोगे मिटेगा नहीं।
    मैं तो पतझर था फिर क्यूँ निमंत्रण दिया
    ऋतु बसंती को तन पर लपेटे हुये,
    आस मन में लिये प्यास तन में लिये
    कब शरद आयी पल्लू समेटे हुये,
तुमने फेरीं निगाहें अँधेरा हुआ, ऐसा लगता है सूरज उगेगा नहीं।
    मैं तो होली मना लूँगा सच मानिये
    तुम दिवाली बनोगी ये आभास दो,
    मैं तुम्हें सौंप दूँगा तुम्हारी धरा
    तुम मुझे मेरे पँखों को आकाश दो,
उँगलियों पर दुपट्टा लपेटो न तुम, यूँ करोगे तो दिल चुप रहेगा नहीं।
    आँख खोली तो तुम रुक्मिणी सी लगी
    बन्द की आँख तो राधिका तुम लगीं,
    जब भी सोचा तुम्हें शांत एकांत में
    मीरा बाई सी एक साधिका तुम लगी
कृष्ण की बाँसुरी पर भरोसा रखो, मन कहीं भी रहे पर डिगेगा नहीं।

प्रस्तुतकर्ता - मनोज कुमार शर्मा

शुक्रवार, अप्रैल 05, 2013

मुझमें क्या है सिवा तुम्हारे....

डॉ कुमार विश्वास की एक कविता:

मुझमें क्या है सिवा तुम्हारे

टी वी वाले पूछ रहे हैं, क्या छोड़ोगे नए साल में
उधर सुना है अमरीका में, ऐसा कुछ रिवाज़ है शायद
नए साल में खुद ही खुद कुछ, अपने में से कम करने का
मैं क्या छोडू समझ नहीं पाया हूँ अब तक, मुझमें क्या है सिवा तुम्हारे
और तुम्हें कम कर दूँ तो फिर, कहाँ बचूँगा नए साल में ......

सोमवार, जनवरी 14, 2013

शैलेष लोढ़ा के नाम एक खुला पत्र


शैलेष जी,

"वाह वाह क्या बात है" के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. धन्यवाद इसलिए कि कविता और हिंदी के माधुर्य से वंचित होते जा रहे थे. भोंडे और व्यर्थ धारावाहिकों से बचने के लिए सब टीवी देखना शुरू किया. कम से कम सब टीवी पर धारावाहिक भोंडे नहीं हैं पर स्तरहीन हैं. वाह वाह क्या बात है एक जबरदस्त धारावाहिक बन कर उभरा. बस यह समझ लीजिये कि एक साधारण से रत्न की चाह थी और माणिक मिल गया. (मैं अतिश्योक्ति नहीं कर रहा हूँ, इसीलिए कोहिनूर नहीं कहा.) लगातार स्तरहीन धारावाहिकों से मन खिन्न हो गया था. "चिड़ियाघर" और "R. K. लक्ष्मण की दुनिया" को देख कर ऐसा लगता है कि क्या दर्शक इतने ही मुर्ख हैं या इन धारावाहिक बनानेवालों ने हमे इतना मुर्ख समझ लिया है. धीरे धीरे लापतागंज का स्तर भी गिरता चला गया. इमानदारी से कहता हूँ, इन धारावाहिकों का हाल देखकर "वाह वाह क्या बात है" से भी कोई ज्यादा उम्मीद नहीं थी. मैं इस धारावाहिक को भी ऐसा ही सोच रहा था. पर जब एक बार देखा तो दिल खुश हो गया. बस अगली पिछली सारी किश्तें देख डाली.

यहाँ पर आये हुए काफी सारे कवि तो हास्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं और कुछ बन जायेंगे. साहित्य के इन ध्रुव तारों को भी सुना जैसे गोपालदास "नीरज", "डॉ. कुंवर बेचैन" और मानो जीवन धन्य हो गया. डॉ. कुंवर बेचैन जी को अपने कॉलेज की लाइब्रेरी में सुना था. उनकी कविता "क्या यह सूरज है तेरी औकात इस दुनिया में, रात के बाद भी है एक रात इस दुनिया में." की पंक्ति "किसी दीये पर अँधेरा उछाल कर देखो" मेरा जीवन मंत्र है. क्या यह कविता पूरी सुनाने को मिल सकती है? यदि ऐसा हुआ तो मैं हमेशा आपका ऋणी रहूँगा. महाकवि गोपालदास "नीरज" को सुना मन प्रसन्न हो गया और "हरी भरी वसुन्धरा पर नीला नीला ये गगन" से कार्यक्रम का आरम्भ, मन पुलकित हो गया. मैंने अपने बच्चो से इस गीत को याद करने को कहा और मेरे लिए सुखद आश्चर्य यह था कि मेरी दोनों बेटियों को पहले से ही याद था.

जो कविता और कवि के बारे में जानने को मिलता है उसका आनंद तो पूछो मत. जैसे डॉ. कुंवर बेचैन जी पर ८ पी. इच. डी. की जा चुकि हैं. कवि के परिवारवाले और मित्र जो उस कवि के बारे में बताते हैं वह तो कहीं मिल ही नहीं सकता. कवि जैमिनी ने आपको अपना बेटा बताया वो बहुत बढ़िया लगा. कवि अपनी पत्नी पर ही इतना हास्य कर लेते हैं. मजे की बात यह है कि उसी पर सबसे ज्यादा विश्वास करते हैं. आप ध्यान दे जब कवि का सम्मान हो चुका है उनकी पत्नी के साथ आकर खड़ी हो गयी है. तब माइक हाथ में लेते वक्त किस सहजता से पुरुस्कार का कलश पत्नी के हाथ में चला जाता है. बड़ा मजा आता है देखकर. कवि "शक से ना (सक्सेना)" का सम्मान हुआ तो एक अविस्मरणीय बात पता चली की वो आज भी अपने पुत्र के साथ एक ही थाली में खाते हैं. परन्तु मैंने इन दोनों के बीच कलश का ऐसा हस्तांतरण नहीं देखा. (मैं गलत भी हो सकता हूँ.)

माफ़ करना अंत में एक सुझाव जरूर दूंगा, कृपया नेहा जी की इतनी खिचाई ना करें. आप जिस जगह पहुँच गए है वहां से ऐसा करना शोभा नहीं देता। वह भी तब जब वो आपको अपना गुरु मान चुकी हैं. नारी का अपमान देख कर कष्ट होता है.

- मनोज कुमार शर्मा

रविवार, जुलाई 01, 2012

रूठे रूठे पिया......

आज सुबह से एक गाना जबान से नहीं उतर रहा था। रूठे रूठे पिया......जया भादुडी (बच्चन) और विजय आनन्द पर फ़िल्माए गए इस गीत के बोल है- मैंने इसे सुना है पर देखा नहीं है. यह गाना बड़ा ही रोमांटिक है बरबस चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाती है. ख़राब से ख़राब मूड भी ठीक हो जाता है.

रूठे रूठे पिया मनाऊँ कैसे
आज न जाने बात हुई वो क्यों रूठे मुझसे
जब तक वो बोले न मुझसे मैं समझूँ कैसे
रूठे रूठे पिया, पिया आ आ आ आ
रूठे रूठे पिया मनाऊँ कैसे
रूठे रूठे पिया
वो बैठे है कुछ ऐसे शादी में दुल्हन जैसे
क्या बन के दूल्हा मैं जाऊँ और उनकी मांग सजाऊँ
लम्बी दुल्हन ठिंगना दूल्हा जोडी जमे कैसे
रूठे रूठे पिया पिया आ आ आ आ
रूठे रूठे पिया मनाऊँ कैसे
रूठे रूठे पिया
क्या मुझसे हसीं है किताबें, पिया प्यार से जिनको थामे
मैं नैन मिलाना चाहूँ पर नैन मिला न पाऊँ
सौतन चश्मा बीच में आए, नैन मिले कैसे
रूठे रूठे पिया पिया आ आ आ आ
रूठे रूठे पिया मनाऊँ कैसे
रूठे रूठे पिया

मेरा दूसरा मनपसंद गाना: यह गाना है एक बेमिसाल फिल्म "घर" का. इसे लिखा है गुलजार साहब ने, संगीत से सवार है राहुलदेव बर्मन जी ने और सुर दिए हैं लता जी ने......

तेरे बिना जिया जाए ना......२
तेरे बिना जिया जाए ना.....२
बिन तेरे तेरे बिन साजना
साँस में साँस आए ना
तेरे बिना जिया जाए ना, तेरे बिना जिया जाए ना
बिन तेरे तेरे बिन साजना
साँस में साँस आए ना
तेरे बिना जिया जाए ना.....

जब भी ख़यालों में तू आए मेरे बदन से ख़ुश्बू आए..... २
महके बदन में रहा न जाए..... रहा जाए ना
तेरे बिना जिया जाए ना... २
बिन तेरे तेरे बिन साजना
होओ.... साँस में साँस आए ना
तेरे बिना जिया जाए ना... २

रेशमी रातें रोज़ न होंगी ये सौगातें रोज़ न होंगी.... २
ज़िंदगी तुझ बिन रास न आए, रास आए ना.....


तेरे बिना जिया जाए ना... २
बिन तेरे तेरे बिन साजना
साँस में साँस आए ना होओ.... तेरे बिना जिया जाए ना...

लता जी ने बहुत ही बेहतरीन अंदाज में गाये हैं। लता जी के लिए दो शब्द कहे है किसी ने.... जानने  के लिए क्लिक करें स्वर सम्राज्ञी

शनिवार, जून 02, 2012

खांसी


खांसी यूं तो अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, पर यह शरीर के अंदर पनप रही या पनपने की कोशिश कर रही दूसरी बीमारियों का लक्षण जरूर है। वैसे, आम इलाजों से खांसी ठीक भी हो जाती है, पर कई बार यह किसी गंभीर बीमारी की ओर भी इशारा कर सकती है, इसलिए इसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं है।

यह नवभारत टाइम्स से संभार: एक्सपर्ट्स से बात करके खांसी के बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं नरेश तनेजा : 

क्या होती है खांसी 
खांसी फेफड़ों, सांस की नलियों और गले में इन्फेक्शन या किसी कमी की वजह से होती है। नाक या मुंह की बीमारियों से खांसी नहीं होती। खांसी फेफड़ों या श्वसन तंत्र की किसी दूसरी बीमारी का लक्षण है, यानी खांसी इशारा है इस बात का कि शरीर के अंदर कोई बीमारी है। इसे शरीर का एक तरह का सुरक्षा मिकेनिज्म या उपाय भी कह सकते हैं। खांसी करके हमारा सिस्टम शरीर को बीमारियों के जीवाणुओं और कीटाणुओं से मुक्ति दिलाने की कोशिश करता है। इसमें हमें थोड़ी तकलीफ तो जरूर होती है क्योंकि मांसपेशियों व शरीर के बाकी अंगों पर जोर पड़ता है, लेकिन असल में उस समय शरीर अंदर ही अंदर अपनी रक्षा करने की कोशिश कर रहा होता है। हालांकि कई बार खांसी दूसरों तक बीमारी के कीटाणु या जीवाणु फैलाने का कारण भी बन जाती है। 

कितनी तरह की होती है 
सामान्य खांसी, ठस्के वाली खांसी (जिसका दौरा पड़ता है), कुकुर खांसी, काली खांसी और दमे से होने वाली खांसी। काली खांसी ऐसी खांसी को कहते हैं, जो लगातार आए, जिसमें सांस लेने का भी मौका न मिले और काफी देर बाद सांस आता हो। खांसी का ठस्का-सा लगता है। अमूमन यह बच्चों और किशोरों को होती है। 

क्यों होती है खांसी 
दमे से, गले में इन्फेक्शन से, टॉन्सिल्स से, फेरॅनजाइटिस से, ब्रोंकाइटिस से, फेफड़ों के इन्फेक्शन या दूसरी बीमारियों से, न्यूमोनिया से, दिल की बीमारियों की वजह से, बच्चों में पेट के कीड़ों के फेफड़ों में पहुंचने पर और एसिडिटी आदि से खांसी होती है। 

हो सकती है यह दिक्कत 
खांसी में बेचैनी, आंखों में खून या लाली आ जाना, सिरदर्द, कभी-कभी फेफड़ों में सूजन होना, मांसपेशियों पर जोर पड़ने से छाती में दर्द आदि हो सकता है। 

क्या संकेत करती है 
आपके श्वसन तंत्र या गले या फेफड़ों में कोई तकलीफ है, उसे नजरअंदाज न करें। लगातार तीन हफ्ते से ज्यादा खांसी रहे तो टीबी का संकेत हो सकती है, जिसकी पूरी जांच होनी चाहिए। 

ये बातें याद रखें 
कई बार एसिडिटी की वजह से भी खांसी होती है क्योंकि पेट में बना एसिड ऊपर चढ़कर सांस की नली में चला जाता है। ऐसे में एसिडिटी का इलाज जरूरी है, न कि खांसी का। 
कई बार दिल का बायां हिस्सा बढ़ जाए या फेफड़ों की नसों का प्रेशर ज्यादा हो तो भी खांसी होने लगती है। इसे दिल का अस्थमा भी कहते हैं। 
खांसी दमा का लक्षण भी हो सकती है। हालांकि दमा होने पर खांसी के वक्त सीटी बजना जरूरी नहीं है। 
सिर्फ खांसी होना स्वाइन फ्लू का लक्षण भी हो सकता है। 
तीन हफ्ते से ज्यादा खांसी होने पर टीबी की जांच करवा लेनी चाहिए। ऐसे में बलगम की तीन बार जांच करानी चाहिए। 
दूसरों से दूर होकर खांसें। मुंह पर नैपकिन रख लें और खांसने के बाद उसे डस्टबिन में फेंक दें। 
खाना खाते वक्त खांसी आए तो ध्यान से धीरे-धीरे खाएं, वरना खाने के टुकड़े सांस की नली में जा सकते हैं। 
कुछ खाना फंस जाने से खांसी आने लगे तो पीड़ित की पीठ सहला दें। गुनगुना पानी पिला दें। आराम न मिले तो डॉक्टर को दिखाएं। 
लेटते वक्त कोई भी खांसी बढ़ जाती है क्योंकि लेटने पर दिल पर प्रेशर बढ़ जाता है। 

क्या ये सेफ हैं 
खांसी की गोलियां मसलन विक्स, हॉल्स, स्ट्रेप्सिल्स आदि सेफ हैं। इनका कोई नुकसान नहीं है। इनसे आराम भी महसूस होता है। कफ सिरप भी लिए जा सकते हैं, पर कफ सिरप से शरीर और दिमाग में जरा सुस्ती आ जाती है। 

एलोपैथी 

एलोपैथी के अनुसार खांसी अलग-अलग तरह की होती है - नाक की खांसी, गले की खांसी, फेफड़े या दिल की खांसी। नाक की खांसी को नैसल एलर्जी या नैसल अस्थमा भी कहते हैं। इसमें खांसी के साथ छींकें व नाक से पानी बहता है। 

दवा : सिट्रिजिन-10 एमजी ( Cetrizine ) या एलेग्रा-120 एमजी ( Allegra ) की एक गोली रोज। 

गले की खांसी 
गले की खांसी सूखी व बलगम वाली, दोनों हो सकती है। एक में गले में सिर्फ खराश होगी और खांसी नहीं आएगी। दूसरे में खराश के साथ खांसी आएगी। 

खराश के साथ खांसी आए तो विटामिन-सी की गोली के साथ सिटजिन-10 एमजी या एलेग्रा-120 एमजी या तीन बार विकोरिल (Wikoryl) की गोली दी जा सकती है। अगर सिर्फ खराश हो तो पेंसिलिन ग्रुप की दवाएं दी जा सकती हैं। 

फेफड़े या दिल की खांसी 
खांसी में अगर बलगम के साथ सीटी भी बज रही है तो फेफड़ों की खांसी कही जाएगी। इसके लिए ब्रोंकोडिल या ब्रोंकोरेक्स सिरप के अलावा इनहेलर भी दिया जा सकता है। 

अगर बिना बलगम और बिना सीटी के सूखी खांसी है तो यह हार्ट का अस्थमा हो सकता है। इसमें फौरन जांच करानी चाहिए। जांच के बाद ही दवाएं दी जा सकती हैं। 

इसके अलावा, साइनस या एसिडिटी से होने वाली खांसी भी होती है। इनमें भी जांच के बाद लक्षणों के अनुसार दवा दी जाती है। 

सिरप या चूसने की गोलियां 

सिरप 
शुगर के मरीज हिमालय ड्रग्स कंपनी का डायकफ सिरप या प्रोस्पैन सिरप ले सकते हैं। ये दोनों शुगर फ्री हैं। आम लोग भी इन्हें ले सकते हैं। 

मुल्तानी फामेर्सी वालों का कूका सिरप, कासामृत सिरप, अमृत रस सिरप, सोममधु सिरप या हिमालय ड्रग्स का सेप्टिलीन सिरप या महर्षि फार्मा का कासनी सिरप लें। इसके अलावा, एलोपैथी में एलेक्स, कफरिल, ब्रोंकोरेक्स व ब्रोंकोडिल सिरप हैं। 

चूसने की गोलियां 
लवंगादि वटी, कासमर्दन वटी, कंठसुधारक वटी, कर्पूरादि वटी या खादिरादि वटी की एक या दो गोली दिन में चार बार चूसें। 

लौंग, मुलहठी, स्वालीन, हॉल्स, विक्स, हनीटस या अदरक कैंडी चूसें। 

होम्योपैथी में सिरप 
रेकवैग का जस्टसिन (Justussine), एसबीएल का स्टोडल (Stodal) और बैक ऐंड कॉल कंपनी का कॉफीज (Cofeez) सीरप। इन्हें शुगर के मरीज भी ले सकते हैं क्योंकि ये मीठे में नहीं बनाये जाते। 

खांसी में परहेज 
ये चीजें न खाएं 
मूंगफली के ऊपर से पानी, चटपटी व खट्टी चीजें, ठंडा पानी, दही, सॉस, सिरका, अचार, अरबी, भिंडी, राजमा, उड़द की दाल, लेसदार चीजें, खट्टे फल, केला, कोल्ड ड्रिंक, इमली, तली-भुनी चीजों को खाने के बाद पानी न पीएं। एकदम गर्म खाकर भी ठंडा पानी न पीएं। फ्रिज में रखी चीजें व चॉकलेट न खाएं। ठंडा दूध न लें। 

इनको आजमाएं 
दूध में सौंठ डालकर पीएं। 
सौंठ डालकर गरम पानी पीएं। 
गुनगुना पानी पीएं। 
मुलहठी चूसें। 
शहद, किशमिश, मुनक्का लें। 
शुगर वाले एक-दो अंजीर पीसकर या रात को भिगो कर लें। 
धुएं व धूल से बचाव रखें। 

होम्योपैथी 
सूखी खांसी : ब्रायोनिया-30 (Bryonia) या स्पॉन्जिया-30 (Spongia) 
बलगमी, घरघराहट वाली खांसी : एन्टिम टार्ट-30 (Antim Tart) या आईपीकॉक-30 (Ipecac) 
जुकाम बुखार के साथ खांसी : बेलाडोना-30 (Belladonna) या एकोनाइट-30 (Aconite) या हेपरसल्फर-30 (Hepar Sulphur) 
काली खांसी : ड्रोसेरा-30 Drosera) या कूप्रम मैट-30 (Cuprum Mat) 

बच्चों की खांसी : सूखी और शुरुआती खांसी है तो बेलाडोना-30 बेलाडोना-30 (Belladonna), बलगमी हो तो सेम्बूकस-30 (Sambucus) या फॉसफोरस-30 (Phosphorus)। चार से छह गोली दिन में तीन बार सात दिन तक दें। 

रात को दिक्कत हो तो : ट्रायो ऑफ कफ मेडिसिन के नाम से तीन दवाएं आती हैं। जिन लोगों को खांसी की दिक्कत अक्सर होती हो, उन्हें इन्हें घर में रखना चाहिए। ये हैं : बेलाडोना-30 (Belladonna) व हेपर सल्फर-30 (Hepar Sulphur) व स्पॉन्जिया-30 (Spongia)। रात को इमरजेंसी में इनमें से किसी एक की चार-छह गोलियां एक-एक घंटे बाद थोडे़ गर्म पानी से ले सकते हैं। स्पॉन्जिया-30 (Spongia) दिल के मरीजों के लिए खांसी की स्पेशल दवा है। 

नोट : ऊपर लिखी सभी दवाएं शुगर, ब्लड प्रेशर और दिल के मरीज भी ले सकते हैं। सभी की डोज एक जैसी होगी। दिन में चार बार पांच-पांच गोलियां लें। 

आयुर्वेद 
आयुर्वेद के अनुसार, जब कफ सूखकर फेफड़ों और श्वसन अंगों पर जम जाता है तो खांसी होती है। इसके लिए नीचे लिखे तरीकों में से कोई एक करें। इन दवाओं और नुस्खों को बीपी या दिल के मरीज भी अपना सकते हैं, पर डायबीटीज के मरीज सितोपलादि चूर्ण और कंठकारी अवलेह न लें क्योंकि उनमें मीठा होता है। 

सूखी खांसी 
हिमालय की सेप्टिलिन एक गोली सुबह-शाम सात दिन तक लें। 
अमृर्ताण्व रस दो गोली सुबह व दो गोली शाम को पानी से लें। 
सितोपलादि चूर्ण शहद में मिलाकर एक चम्मच चाटें। बच्चों को भी दे सकते हैं। 
तालिसादि चूर्ण (करीब आधा चम्मच) पानी से दिन में तीन बार लें। बच्चों को भी दे सकते हैं। 
जे एंड जे डिशेन कंपनी की डेंजाइन या डेस्मा की एक-एक गोली तीन बार पानी से लें या बिना पानी के चूसें। शुगर के मरीज और बच्चे भी ले सकते हैं। 
चंदामृत रस की दो-दो गोली सुबह-शाम पानी से लें। शुगर के मरीज और बच्चे भी ले सकते हैं। 
ज्यादा खांसी हो तो सेंधा नमक की छोटी-सी डली को आग पर रखकर गर्म करें और एक कटोरी पानी में डाल कर बुझा लें। उसी डली को फिर गर्म करें और पानी में डाल लें। ऐसा पांच बार करके यह पानी पिला दें। दिन में दो बार करें। बच्चों के लिए मुफीद है। 
थोड़ी-सी फिटकरी को तवे पर भूनें। आधी मात्रा में अभ्रक भस्म मिलाकर चाटें। 
हींग, त्रिफला, मुलहठी और मिश्री को नीबू के रस में मिलाकर चाटें। 
त्रिफला और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से भी फायदा होता है। 
12 ग्राम हल्दी, 24 ग्राम गुड़ और तीन ग्राम पकाई हुई फिटकरी का चूर्ण मिलाकर गोलियां बना लें और दो-दो गोलियां दिन में दो-तीन बार चूसें। 
तुलसी, काली मिर्च और अदरक की चाय पीएं। 
दिन में दो बार गुनगुने दूध के गरारे करें। 
दिन में दो-तीन बार शहद चाटें। 
रात को गर्म चाय या दूध के साथ आधी चम्मच हल्दी की फंकी लें। 
खराश में कंठकारी अवलेह आधा-आधा चम्मच दो बार पानी से या ऐसे ही लें। 

बलगमी खांसी 
हमदर्द का जोशीना गर्म पानी में डालकर लें। 
महालक्ष्मी विलास रस की एक गोली दो बार पानी से लें। 
कफांतक रस की एक गोली दिन में तीन बार कत्था-चूना लगे हुए पान के साथ लें। 
काली मिर्च के चार दाने घी में भूनकर सुबह-दोपहर और शाम को लें। 
काली मिर्च के चार दाने, एक चम्मच खसखस के दाने और चार दाने लौंग को गुड़ में मिलाकर गर्म करके तीन हिस्से कर लें। दिन में एक-एक कर तीन बार लें। 
पीपली, काली मिर्च, सौंठ और मुलहठी का चूर्ण बनाकर रख लें। चौथाई चम्मच शहद के साथ दिन में दो बार चाट लें। 
चौथाई कटोरी पानी में पान का पत्ता और थोड़ी-सी अजवायन को डालकर उबाल लें। आधा रहने पर पत्ता फेंक दें। पानी में चुटकी भर काला नमक व शहद मिलाकर रख लें। इसी में से दिन में दो-तीन बार पिलाएं। बच्चों के लिए बेहद फायदेमंद है। 
विक्स, नीलगिरी का तेल, यूकेलिप्टस का तेल, मेंथॉल ऑयल में से कोई भी गर्म पानी में डालकर दिन में दो-तीन बार स्टीम लें। सादे गर्म पानी की भाप भी ले सकते हैं। 

जुकाम-बुखार के साथ खांसी 
महालक्ष्मी विलास रस या त्रिभुवन कीर्ति रस की एक-एक गोली दो बार लें। 
संजीवनी वटी एक गोली दिन में दो बार लें। 
नागवल्लभ रस की एक गोली दिन में तीन बार पान के पत्ते में लपेटकर या आधा चम्मच अदरक के रस के साथ लें। 
कफकेतु रस की एक गोली को आधा चम्मच अदरक के रस से दिन में दो बार लें। 
लसूड़े को बीज समेत बिना घी के थोड़ा-सा भूनकर उसमें आधा चम्मच सौंठ, दो लौंग और चौथाई चम्मच दालचीनी मिलाकर पानी में उबालकर चीनी डालकर शर्बत बना लें। इसे दिन में दो-तीन बार लें। 
एक बताशे में एक काली मिर्च डालकर चबा लें। इस तरह दिन में एक बार तीन-चार बताशे खाएं। 

घरघराहट या खड़खड़ वाली खांसी 
इस खांसी में पसलियां चलती हैं, जिससे छाती में से आवाज-सी निकलती है। 
तालिसादि चूर्ण तीन ग्राम पानी से दिन में तीन बार लें। 
वासावलेह आधा चम्मच गर्म पानी से दिन में दो बार लें। 
एक्सपर्ट से पूछकर श्रृंग भस्म और सितोपलादि चूर्ण का मिक्सचर लें। 
लक्ष्मी विलास की एक-एक गोली सुबह-शाम पानी से लें। 
चिरौंजी को पीसकर थोड़े से घी में छौंक लें और दूध मिलाकर उबालें। इसमें थोड़ा इलायची पाउडर और शहद मिलाकर पी लें। शुगर के मरीज बिना शहद के लें। 
रात को सरसों का तेल गर्म करके छाती पर मलने के बाद रुई या गर्म कपड़ा छाती पर बांध दें। 
छाती पर गर्म पानी की बोतल भी रख सकते हैं। 
ऐलोविरा का गूदा निकालकर उसे भूनकर पांच काली मिर्च मिलाकर गोली बना लें। बच्चों को दो-दो गोली सुबह-शाम दूध से दें। रात में इमरजेंसी होने पर भाप लें और जुशांदे को गर्म पानी में उबालकर लें। 

नोट : सभी दवाएं किसी वैद्य की देखरेख में लें। 



चंद सवाल-जवाब 
खांसी व अस्थमा में क्या फर्क है ? 
अस्थमा होने पर छाती से सीटी और शां शां की आवाज आती मालूम पड़ती है और सांस फूल जाता है, जबकि साधारण खांसी गले में खराबी की वजह से भी हो जाती है। 

खांसी न्यूमोनिया से हुई है या वायरल से हुई है, कैसे पहचानें? 
वायरस से होने वाली खांसी आम होती है, पर न्यूमोनिया से होने वाली खांसी में एक्सरे कराने पर न्यूमोनिया का पैच दिखाई देता है। ब्लड टेस्ट कराने पर भी न्यूमोनिया के लक्षण सामने आ जाते हैं। 

पफ व नेबुलाइजर की जरूरत कब पड़ती है? 
अगर सांस लेने पर सीटी की आवाज आए और आप घर पर हों तो नेबुलाइजर की मदद लें। अगर घर से बाहर हों तो जेब में रखने वाला पफ या इनहेलर लें। जरूरत के अनुसार यह दिन में दो बार लिया जा सकता है या डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसका यूज करें। 

बलगम में खून आए तो? 
खांसी से खून आए तो घबराना नहीं चाहिए। कई बार जोर से खांसने पर भी खून आ जाता है। खून आने पर देखना चाहिए कि उसका रंग लाल है या काला। ऐसे में खून की जांच और छाती का एक्सरे व सीटी स्कैन करवाना चाहिए। बार-बार खून आए तो टेस्ट जरूर करा लेने चाहिए। टीबी और लंग कैंसर की वजह से भी खून आ सकता है। टीबी की जांच के लिए ईएसआर, बैक्टीरिया के लिए टीएलसी और वायरस के लिए डीएलसी जांच की जाती है। 

डॉक्टर के पास कब जाएं? 
अपने आप डॉक्टर न बनें और न ही घरेलू इलाज के भरोसे रहें। डॉक्टर को दिखाना ही बेहतर है। 

कितने दिनों बाद समझें कि खांसी खतरनाक है? 
खांसी को एक हफ्ते से ज्यादा हो जाए तो ब्लड की जांच कराएं। 

एक्सपर्ट्स पैनल 
डॉ. आर. एन. कालरा, सीनियर फिजीशियन 
डॉ. बीर सिंह, सीनियर फिजीशियन, एम्स 
डॉ. के. के. अग्रवाल, सीनियर फिजीशियन 
आचार्य विक्रमादित्य, आयुर्वेद विशेषज्ञ 
सुरक्षित गोस्वामी, योग गुरु

भारत का भ्रष्टाचार संग्राम


यह कैसा नजारा है.... नौकर, मालिक को हद सिखा रहा है ... इस देश का हर व्यक्ति यह जान ले, देश का कानून, देश का संविधान, हमारी संसद. कुछ भी जनता से ऊपर नहीं है. यह सब देश की जनता के लिए हैं. जनता इसमे बदलाव चाहती है तो वह चीज बदलेगी. चाहे कानून हो, संसद हो या संविधान हो. सभी नेता यह जान ले अब नहीं चलने वाली नौकरों की बदतमीजी.
अन्ना तो देश के आम आदमी का चेहरा है. यह सैलाब तो वर्षों से उमड़ रहा था. परन्तु हम सभी मक्कारी को देखते देखते थक गए.
नेताओं ने अपनी मक्कारियों की सभी हदें पार कर दीं. वो कहत हैं इतनी जल्दी नहीं पास होगा यह बिल. मैं एक ही प्रश्न पूछता हूँ. लोकपाल बिल आज नहीं आया वर्षों पहले आ गया था. पर किस पार्टी की सरकार ने पास किया? तो फिर कितना समय चाहिए तुमको बस बहुत हो गया. इसी तरह से समझेंगे यह नेता.
यही नेता जब संसद में हुडदंग मचाते हैं और हम सबको मूक बधिर की तरह देखना पड़ता है. तब संसद की मर्यादा और उसकी सार्वभौमिकता का ख्याल किसी को नहीं आता.

गुरुवार, सितंबर 08, 2011

प्याली में तूफान: हत्यारों से सहानुभूति क्यों?


यह ब्लॉग मैंने दैनिक हिंदुस्तान के वेब साईट पर पढ़ा. सोचा कि सब के साथ बाँट लिया जाय. "प्याली में तूफान" के लेखक श्री शशि शेखर जी के हैं जोकि दैनिक हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक हैं. विस्तार से जानने के लिए इधर क्लिक करें.
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मेरे एक पत्रकार मित्र हैं। जन्म और कर्म से सौ फीसदी भारतीय। पैदा हुए तमिलनाडु में और पले-बढ़े मध्य प्रदेश में। पिछले 30 साल से दिल्ली में काम कर रहे थे। घर में तमिल बोली जाती है। उनकी पत्नी को लगता रहा है कि मेरे पति ‘तमिल कौम’ के प्रति जरूरत के मुताबिक समर्पित नहीं हैं। बरसों से दिल्ली के एक स्कूल में पढ़ाने के बावजूद वह अभी तक चोल और पाण्डय राजाओं के समय में प्रचलित तमिल राष्ट्रवाद की अवधारणा को मन में पालती-पोसती आई हैं। इस चिंतनशील परिवार में पिछले कुछ महीनों से अपने आग्रहों को लेकर बहस पनप रही है। क्यों?
हुआ यूं कि मेरे मित्र को चेन्नई से नई नौकरी का प्रस्ताव आया। उन्हें वहां जाकर न्यूज टीवी चैनल की एक श्रृंखला शुरू करनी थी। इससे पहले भी वह देश के नामचीन चैनलों में काम कर चुके हैं। उन्हें उस तबके का माना जाता है, जो सीना ठोंककर कहता है कि हम ‘ओरिजिनल टीवी जर्नलिस्ट’ हैं। इस न्योते को पाने के बाद वह दुविधा में पड़ गए। दिल्ली में सालों-साल रहते हुए उन्हें लगने लगा था कि वह ‘राष्ट्रीय पत्रकार’ हैं। ऐसे में उस तमिलनाडु, जहां वह कभी रहे ही नहीं, लौटकर चैनल शुरू करना चुनौतीपूर्ण था। वह मेरे पास सलाह लेने आए। मेरा कहना था कि हम सबको अब महानगरों को छोड़कर अपनी-अपनी जमीन की ओर लौटना चाहिए। महानगरों का सिर्फ एक ही चरित्र होता है कि उनका कोई चरित्र नहीं होता। तरह-तरह के लोग रोजगार की तलाश में हर रोज यहां भीड़ बढ़ाते हैं और फिर उसी में गुम हो जाते हैं।
इसके बरखिलाफ मंझोले और छोटे शहरों में अब भी स्पंदन है। उनका अपना मुकम्मल चरित्र और चेहरा है। चाल भले ही थोड़ी सुस्त हो, पर देश की तरक्की में उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्हें मेरी बात जंच गई और कुछ ही दिन में वह चेन्नई जा बसे। पर फोन पर बातचीत जारी रही। कुछ महीने पहले जब वहां चुनावी बुखार तपिश की सीढ़ियां चढ़ रहा था, उनका फोन आया। खासे उत्तेजित थे। कहने लगे- ‘सर, यहां तो सब कुछ बदल गया है। हम जो तमिल अपने घर में बोलते हैं, उस पर लोग भौंह चढ़ाते हैं।
राजनीतिज्ञों ने भाषा पर भी कब्जा जमा लिया है। पिछले 40 साल के दौरान स्कूली किताबों में इस तरह के शब्द जोड़ दिए गए हैं, जिन्हें मुंह पर लाना हमारे यहां अच्छा नहीं माना जाता है।’इसके बाद वह देर तक बताते रहे कि किस तरह तमिलनाडु के लोगों के आचार और व्यवहार में अंतर आया है और वह वहां पहुंचकर महसूस कर रहे हैं कि उनके अप्पा और अम्मा जिस‘मद्रास’ की बात किया करते हैं, वह अतीत की अंधी गली में गुम हो चुका है। मैंने उन्हें समझाने के लिए कहा कि यह हाल तो उत्तर भारत का भी है। गांव, कस्बे-शहर सब बदल गए हैं। उनका जवाब था कि अभी तक व्याकरण और बोली के तौर पर हिंदी सियासत का शिकार नहीं हुई। मुझे लगा कि दिल्ली का नॉस्टेल्जिया उन्हें सता रहा है और वह अति भावुक हो रहे हैं।
पिछले हफ्ते फिर फोन आया- ‘अरे साहब, यहां तो गजब हो रहा है। राजीव गांधी के बचे-खुचे हत्यारों को 9/11 को फांसी दी जानी है, पर कुछ लोग उबले पड़ रहे हैं। एक ने तो आत्मदाह तक कर लिया। अजीब बात है। सब जानते हैं कि ये एक पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारे हैं, फिर भी राजनीति हो रही है। अब तक मैं जैसी पत्रकारिता करता आया हूं, उतनी तटस्थता यहां के चंद स्वार्थी लोगों को नागवार गुजर सकती है, फिर भी मैं अपना काम करता रहूंगा।’ मैंने उनसे कहा कि इस मानसिकता पर एक लेख ‘हिन्दुस्तान’ के लिए लिख भेजिए। उन्होंने हां कर दी, पर बाद में एक एसएमएस आ गया कि व्यस्तता की वजह से लिख पाना संभव नहीं है। यह एक नए और 24 घंटा खबर उगलने वाले संपादक की विवशता थी या वह आवेगमयी भावना का शिकार बनने से डर रहे थे।
जो भी हो, दो दिन बाद खबर आ गई कि वहां के हाईकोर्ट ने फांसी पर आठ हफ्ते के लिए रोक लगा दी है। इस बार मैंने उनको फोन कर पूछा कि इस फैसले से आपको राहत मिली होगी?कम-से कम कुछ हफ्ते आप अपनी नैतिक ऊहापोह से बचे रहेंगे। वह हंसते हुए आगे बोले- ‘यहां तो हर ओर खुशी का आलम है।’ मैं फोन काटने के बाद देर तक सोचता रहा कि जब भी कोई आतंकवादी हमला होता है, तो लोग समूची व्यवस्था को लचर करार दे देते हैं। कोई हमारे लोकतंत्र को लिजलिजा बताता है, तो किसी की आग उगलती हुई जुबान पर सान चढ़े हुए शब्द होते हैं। हमलावर अंदाज में आम आदमी पर इन्हें उगलते हुए नेतागण भूल जाते हैं कि लोगों के दिलों पर गहरे घाव भी हो सकते हैं। पर जब आतंकवादियों को फांसी देनी होती है, तो इस तरह के लोग बिलों में दुबक जाते हैं, उलटबांसियां बोलने लगते हैं। सियासत का यह दोमुंहापन खतरनाक है। दुर्भाग्य, तमिलनाडु इसका अकेला उदाहरण नहीं है।
इन पंक्तियों को लिखते समय ही खबर आई कि पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने राष्ट्रपति को खत लिखा है। वह चाहते हैं कि देविंदरपाल सिंह भुल्लर का मृत्युदंड मुआफ कर दिया जाए। ये वही भुल्लर हैं, जो 1993 में युवक कांग्रेस के दफ्तर के सामने कार में विस्फोट कराने के षड्यंत्र में शामिल थे। आतंकवाद का मुखरता से विरोध करने वाले मनिंदरजीत सिंह बिट्टा की हत्या के लिए प्रायोजित इस हमले में आधा दर्जन से अधिक लोग मारे गए थे। अपनी गिरफ्तारी के बाद से पिछली 26 मई, 2011 तक निचली अदालत से लेकर राष्ट्रपति तक भुल्लर अपने सभी कानूनी हक आजमाकर देख चुका है। हर दरवाजे से दुत्कारे जाने के बाद राजनेता उसे बचाने के लिए आगे आए हैं। बादल से पहले अमरिंदर सिंह उसके प्रति अपनी सहानुभूति जगजाहिर कर चुके हैं। ये वही अमरिंदर हैं, जो कांग्रेस की नुमाइंदगी करते हैं और पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। क्या वह राजीव गांधी के हत्यारों के प्रति भी यही रवैया प्रदर्शित करना चाहेंगे?
जब तमिलनाडु और पंजाब में ऐसी हलचल मची हो, तो जम्मू-कश्मीर के हुक्मरां कैसे चुप रह सकते हैं? उमर अब्दुल्ला भी चाहते हैं कि अफजल की फांसी के फैसले पर पानी फेर दिया जाए। अमरिंदर सिंह की तरह ही उमर अपने आजाद खयालों के लिए जाने जाते हैं और अक्सर कट्टरपंथियों की नाराजगी झेलते हैं। पर सियासत के ये चैंपियन अलग मिट्टी के बने होते हैं। अपनी निजी जीवनशैली के चलते भले ही वे किसी से भी टकरा जाएं, पर जब वोटों का सवाल आता है, तो उनमें और किसी अतिवादी में कोई अंतर नहीं रहता।
तय है। इस मानसिकता को बदले बिना हम कभी आतंकवाद से जीत नहीं पाएंगे। हां, एक सुकून जरूर है। पंजाब और कश्मीर के इन उदाहरणों के जरिये मैं अपने मित्र को यह समझाने में कामयाब हुआ कि राजनीति और राजनेताओं के मामले में कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। वह अब शांत और स्थिर हैं।
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मेरे भी एक मित्र हैं, मुंबई में पलेबढ़े, धाराप्रवाह में हिंदी बोलते हैं. हिंदी के आम अलंकारों पर भी शानदार पकड़ है. अपनी मातृभूमि से अगाध प्रेम है. भाषा के मामले में बिलकुल एक जैसे विचार रखते हैं वो भी. एक दिन ऐसी ही चीजें उन्होंने मुझे बतायी थी. वो तमिल सिनेमा को भी इसमे शामिल करते हैं. विशुद्ध गर्वीले भारतीय हैं.
ऐसे लोगों का दर्द मैं समझ सकता हूँ. राजनिति अब देश को तोड़ने में लग गयी है. राजनिति राष्ट्रवाद को  क्षेत्रवाद के पैरों तले कुचलने में लगी है. जनता भोली है. पर दोस्तों भाला बनाते दें नहीं लगेगी.
कई दिनों से लिखना चाहता था. आवेगमयी भावुक विरोध की संभावना को मद्देनजर रखते हुएमैं भी नहीं लिख पाया था. पर आज अपने को रोक नहीं पाया. व्यवाहरिक बनाने की चाह में अपने राष्ट्रवाद को दबा रहा था. परन्तु अन्दर ही अन्दर चुभता था कुछ. आज लिख कर अच्छा लग रहा है. 
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सोमवार, अगस्त 22, 2011

अन्ना ही अन्ना

अन्ना ही अन्ना किया करो दुःख न किसी को दिया करो.
वो लोक-पाल का मालिक है, बस उसके पीछे चला करो...
अन्ना ही अन्ना... हाँ जी अन्ना ही अन्ना...
तो बोलो अन्ना ही अन्ना...

शनिवार, अप्रैल 30, 2011

हमारी राष्ट्रभाषा

एक प्रश्न: हमारी राष्ट्रभाषा क्या है!
उत्तर: हमारी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है.

क्या????? 

जी हाँ हमारी कोई राष्ट्र भाषा नहीं हैं.

हैरान हैं! मैं भी हुआ था. मुझे भी ऐसा ही एक झटका लगा था कि हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी नहीं है. हिंदी भारतीय गणतंत्र की अधिकारिक भाषा है. मतलब हमारे सारे सरकारी कामकाज हिंदी में होते हैं. अंग्रेजी हमारी दूसरी अधिकारिक भाषा है.

सुधिजन कहते हैं, बिना राष्ट्र भाषा के वह देश मूक बधिर है. दोस्तों हम १८०० से ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं के साथ गूंगे बहरे हैं.

जिम्मेवार कौन? हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने पर, कुछ लोगों ने आपत्ति की . परन्तु आपत्ति करने वाले इसके लिए दोषी नहीं हैं. दोषी हैं हम, हिंदी भाषा भाषी लोग. मूलरूप से तो तमिल नेताओं ने हिंदी के राष्ट्रभाषा होने का विरोध किया. सबसे पहले तमिलनाडु में हिंदी विरोध शुरू हुआ. और यह आजकल की बात नहीं है. यह शुरू हुआ १९३७ से. मैं इसके विस्तार में नहीं जाना चाहता. क्योंकि इन लाइनों को पढ़ने के बाद बहुत से लोगों को अचरज होगा और बाकि लोगों का खून उबाल ले रहा होगा - "इन मद्रासियों ने हिंदी विरोध कैसे कर दिया. छोड़ेंगे नहीं इन्हें."

क्या तमिल वाकई जिम्मेवार हैं? मेरा जवाब है नहीं. तब क्या राज ठाकरे - अरे नहीं.
इसके लिए जिम्मेवार हैं हम. हम यानी भारत की सारी जनता जो एक भाषा पर एक मत नहीं हो सके. तमिल, मराठी, असमी और अन्य हिंदी विरोधी लोग, हिंदी को अपनी भाषा नहीं मानते. उनके अनुसार, हिंदी भाषी इसे थोपना चाहता हैं. किसी भी दक्षिण भारतीय को मद्रासी बोल देना, बहुत आम है. लोगों को यह नहीं मालूम हैं कि ४ दक्षिण भारतीय राज्य हैं. और चारों राज्य चार अलग भाषाएँ बोलते हैं. बिहारी को गाली की तरह इस्तमाल करना. किसी भी उत्तर पूर्वी भारतीय को चीनी कहना और फिर खींसे निपोरना. यह सब उत्तरी भारतीयों की आम आदत में शुमार है.  

कोई मलयाली, तेलगू या कन्नडवासी अपने को मद्रासी सुनना नहीं चाहेगा. हमारी लापरवाही का नतीजा है यह. शायद हम और भाषाओं का सम्मान नहीं करते. उनके हिंदी लहजे का मजाक उड़ाते हैं. खासतौर से हिंदी फिल्मों में, विज्ञापनों में. यही हालत उत्तर-पूर्व के राज्यों की है. लोग उन्हें चीनी कहते हैं. लोग दूसरे राज्यों में जा कर वहां की भाषा नहीं सीखते.


यहाँ मैं एक महत्वपूर्ण जानकारी देना चाहूँगा. सारे middle east में हिंदी संपर्क भाषा का काम करती है. यहाँ middle east में भारतीय प्रायदीप के लोग (भारतीय, श्री लंकाई, नेपाली, बंगलादेशी, पाकिस्तानी और अफगानी) ज्यादा हैं. और यहाँ के अरबी भी हिंदी समझ लेते हैं. दुबई हवाई अड्डे पर मैंने अरबी लोगों को नेपाली मजदूरों से हिंदी में बात करते सुना है.

परन्तु मैं राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी नहीं चाहता. राष्ट्र भाषा होनी चाहिए “भारती”. इस भाषा में हिंदी हो, उर्दू की नजाकत हो, पंजाबी का जोश हो, तमिल का "ल" हो. एक ऐसी भाषा जो हमारी १८ भाषाओ का मिश्रण हो. उसमे सभी भाषाओं और लिपियों के वर्ण और शब्द हों. एक नयी भाषा जो सबको अपनी लगे. हम नॉन-तमिल kozhikode को सही उच्चारित कर ही नहीं सकते. हम पढेंगे कोझिकोड. परन्तु यह है कोडिकोड, यह उच्चारण तमिल उच्चारण के सबसे करीब है.

यह तो एक बानगी है. अभी तो काम शुरू करना है.

आपकी टिप्पणियों की प्रतीक्षा में - मनोज